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God's Existence / गॉड्स एग्जिस्टेंस

God's Existence / गॉड्स एग्जिस्टेंस

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Short Description:
What happens when survival requires surrendering morality? Set against relentless Nordic winters, this story examines extremism as a system...

Product Description

  

  • ₹250.00
  • by Ashfaq Ahmad  (Author)
  • Book:  God's Existence: Manav Vikas Yatra
  • Paperback: 262 pages
  • Publisher: Gradias Publishing House
  • Language: Hindi
  • ISBN-13: 978-8199763449
  • Product Dimensions: 22 x 14 x 2 cm

“मनुष्य, धर्म और ब्रह्मांड की तलाश: समझ और सत्य की एक साझा यात्रा”

मनुष्य का इतिहास केवल घटनाओं का क्रम नहीं है; यह प्रश्नों, जिज्ञासाओं और उत्तरों की कभी न समाप्त होने वाली यात्रा है। जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो पाते हैं कि मानव सभ्यता का सबसे बड़ा इंजन— न शक्ति है, न दौलत, न युद्ध— सबसे बड़ा इंजन है जिज्ञासा। यही जिज्ञासा हमें गुफाओं से शहरों तक, पत्थर के औज़ारों से कण त्वरक तक, और मिथकों से आधुनिक विज्ञान तक लाती है।

इस आर्टिकल का उद्देश्य किसी मत का समर्थन करना नहीं है, न किसी विश्वास का खंडन। इसका उद्देश्य केवल इतना है कि हम उन सवालों को समझें जो हम सभी के भीतर जीवित हैं— हम कौन हैं? धर्म कैसे बने? विश्वास और तर्क का रिश्ता क्या है? और ब्रह्मांड की विशालता में मनुष्य की क्या भूमिका है?




1. मानव की शुरुआती यात्रा— जिज्ञासा का जन्म

लगभग तीन लाख वर्ष पहले उभरने वाले होमो सेपियन्स ने शुरुआत में आग, भाषा और औज़ारों की खोज की। ये आविष्कार केवल उपयोगी नहीं थे; इन्होंने हमारी चेतना को नए आयाम दिये। आग ने हमें अँधेरे से बाहर निकाला। भाषा ने हमें कहानियाँ दीं— और कहानियों ने हमें सभ्यताएँ दीं। औज़ारों ने हमें प्रकृति के साथ नया संबंध दिया— हम उपभोक्ता नहीं, निर्माता बन गए। इंसान के शुरुआती सवाल भी इसी समय जन्म लेते हैं—कौन हमें चलाता है? क्यों प्रकृति इतनी सुंदर और भयावह दोनों है? मृत्यु के बाद क्या होता है?


2. धर्मों का उदय— भय, आशा और व्यवस्था

धर्म कोई एक घटना नहीं था; यह हजारों वर्षों में धीरे-धीरे विकसित हुआ। शुरुआत में लोग प्रकृति की शक्तियों को समझ नहीं पाते थे— बिजली, सूखे, तूफान, मृत्यु, बीमारी। इन अनजानी शक्तियों ने मनुष्य को प्रेरित किया कि वह उनके अर्थ ढूँढे। यही अर्थ-खोज क्रमशः पूजा, अनुष्ठान और देवताओं के रूप में बदलती गई।

समय के साथ धर्मों ने तीन बड़े काम किए—

नैतिकता का आधार दिया— सही–गलत की परिभाषा तय की।

समाज को एकता दी— त्योहार, अनुष्ठान और परंपराएँ साझा पहचान बनती गईं।

मनुष्य को सांत्वना दी— मृत्यु, कष्ट और अन्यायी दुनिया में अर्थ प्रदान किया।

धर्म केवल विश्वास नहीं था; वह एक सामाजिक संरचना, एक मनोवैज्ञानिक सहारा और एक सांस्कृतिक प्रणाली भी था।


3. क्या विश्वास हमेशा तर्कसंगत होता है?

नहीं— और यह स्वाभाविक है। हर मनुष्य भावनात्मक भी है और बौद्धिक भी। बहुत-सी मान्यताएँ इसलिए बनीं क्योंकि उन्होंने समाज को एकजुट किया, डर को कम किया और जीवन को अर्थ दिया।

लेकिन प्रश्न यह नहीं कि “विश्वास सही है या गलत।” प्रश्न यह है कि— क्या हम विश्वास को तर्क के साथ संतुलित कर सकते हैं? क्या हम बिना किसी धर्म का अपमान किए, उसे समझने की कोशिश कर सकते हैं? क्या हम ऐसे समाज की कल्पना कर सकते हैं जहाँ विज्ञान और आध्यात्मिकता दोनों संवाद कर सकें?

इस पुस्तक— और इस आर्टिकल का मूल स्वर यही है: समझ का रास्ता संवाद से निकलता है, टकराव से नहीं।

जब विज्ञान उभरा, तो उसने धर्म के प्रश्नों को मिटाया नहीं— बल्कि उन्हें दोबारा परिभाषित किया। अब मनुष्य ने पूछना शुरू किया— ब्रहमांड कैसे बना? भूचाल क्यों आते हैं? जीवन कैसे विकसित हुआ? क्या सब कुछ किसी नियम का पालन करता है? वैज्ञानिक क्रांति का बड़ा योगदान यह था कि उसने मनुष्य को यह सिखाया कि विश्वास और तर्क शत्रु नहीं हैं— वे एक ही सत्य की ओर जाने वाली दो अलग राहें हो सकती हैं।


4. ब्रह्मांड— विस्तार का चमत्कार

हमारी पृथ्वी, हमारा सूरज, हमारी गैलेक्सी— सब ब्रह्मांड का नगण्य हिस्सा हैं। ब्रह्मांड का आकार इतना विशाल है कि उसे समझने के लिए हमें तुलना की भाषा भी छोटी पड़ जाती है—

1 सेकंड में 3 लाख किलोमीटर
1 सितारा = लाखों से अरबों साल पुराना
1 गैलेक्सी = अरबों सितारों की व्यवस्था
दृश्य ब्रह्मांड = लगभग 2 ट्रिलियन गैलेक्सी

इतने विशाल ब्रह्मांड में मनुष्य का अस्तित्व लगभग चमत्कार जैसा है।

और यही सवाल हमें लाता है— क्या यह सब संयोग है, या इसमें कोई व्यवस्था है? यदि व्यवस्था है, तो क्या उसके पीछे कोई बुद्धिमान स्रोत हो सकता है?


5. यदि ईश्वर है— तो विज्ञान के अनुसार कैसा?

यह पुस्तक इस प्रश्न को खुले दिल और खुले दिमाग से देखती है। ईश्वर को मानव-आकार के रूप में नहीं—बल्कि संभावित ऊर्जा, आयाम, नियम और चेतना के रूप में समझने का प्रयास करती है।

विज्ञान कहता है— ऊर्जा नष्ट नहीं होती। नियम स्वतः नहीं बनते। जटिलता अक्सर सरलता से विकसित होती है।

तो क्या यह संभव है कि—ईश्वर कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि एक उच्च आयामी चेतना हो? एक सृजन-नियम? एक ऊर्जा-स्रोत? या वह “तर्क” जिसका हम अभी केवल एक अंश समझते हैं?

यह प्रश्न खुले हैं— और यही उनकी सुंदरता है।


6. सृष्टि सूत्र— पृथ्वी से ब्रह्मांड तक

हमारा ग्रह सूर्य के चारों ओर घूमता है। सूर्य हमारी गैलेक्सी का एक मामूली सितारा है। गैलेक्सी ब्रह्मांड की अनगिनत गैलेक्सियों में से एक है। पृथ्वी पर जीवन मिट्टी और जल नहीं— समय और रसायन विज्ञान का चमत्कार है। DNA की संरचना, विकासवाद, प्राकृतिक चयन— ये सभी मिलकर बताते हैं कि जीवन कोई एक घटना नहीं, बल्कि निरंतर प्रक्रिया है।



7. निष्कर्ष— समझ ही मुक्ति है

इस पूरी यात्रा में एक बात साफ़ होती जाती है— हमारी खोज विज्ञान की नहीं, धर्म की नहीं, बल्कि सत्य की है।

सत्य बहुआयामी हो सकता है— एक हिस्सा विज्ञान बताए, एक इतिहास, एक धर्म, और एक हिस्सा मानव-हृदय।

हमारा उद्देश्य किसी को तोड़ना नहीं— बल्कि यह समझना है कि मनुष्य ने कैसे अपने प्रश्नों, अपने भय और अपने सपनों से मिलकर यह अद्भुत संसार बनाया। यदि हम प्रश्न पूछना नहीं छोड़ते, और सीखने का साहस रखते हैं—तो हम उस सत्य के और करीब जाते हैं, जिसकी तलाश हर मनुष्य करता है।


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